पालक-शिक्षक परिचर्चा

अभी कुछ दिनों से विद्यालयों एवं बच्चों से जुड़ी कई खबरें समाचार पत्र एवं सभी सोशल मीडिया में प्रकाशित हो रही है। ब्लू व्हेल गेम, विद्यालय का परिवेश एवं विद्यालय से जुड़ी घटना तथा दुर्घटना इन्ही विषयों से जुड़ी हुई एक परिचर्चा का आयोजन विद्यालय परिसर में किया गया। इस परिचर्चा में नवीं से बारहवीं के विद्यार्थियों के अभिभावकों को सहभागिता करने हेतु आमन्त्रित किया गया था।
जिसमें विद्यालय के प्राचार्या श्रीमती शुभा रंजन चटर्जी जी ने कई ऐसे महत्वपूर्ण बातें पालकों के साथ साझा की। जो विशेषतया विद्यार्थियों के टीनेजर्स से जुड़ी समस्याओं पर प्रकाश डाल रही थी। अभिभावकों को किस प्रकार से सहयोगात्मक नजरिया रखना है।
टीनेजर्स से जुड़ी महत्वपूर्ण चर्चा का विषय था।

आज के दौर में बच्चों की शिक्षा से भी ज्यादा जरूरी है कि बच्चे के साथ माता-पिता कितना इटरैक्शन करते है । एक बच्चा अपने पेरेंट्स से अच्छी या बुरी बात भी शेयर करता है या नहीं?
यह बात टीन एजर्स के साथ और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योकिं इन बच्चों में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं जिससे उनमें कई मानसिक एवं शारीरिक बदलाव होतें है।
इस तरह के शारीरिक तथा मानसिक बदलाव विद्यर्थियों में एक अलग तरह की सोच , जिज्ञासा, एक अच्छे दोस्त की आवश्यकता का तथा मजबूत सपोर्ट सिस्टम की आवश्यकता की चाहत को जन्म देता है। ऐसा विकल्प वो विद्यार्थी अपने आस पास के वातावरण में ही खोजने लगता है। उस समय उसको आपके और हमारे साथ की जरूरत होती है।
ऐसी परिस्थिति में पालकों को कि चाहिए कि पालक अपने बच्चों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करें। जिससे बच्चा अपने साथ हुई सारी घटनाओं एवं व्यवहार के बारे में सारी बातें आपसे साझा कर सके।

 

प्राचार्या महोदया ने इसी से सम्बंधित ऐसे कई बिन्दुओ पर चर्चा कर पालकों का ध्यान आकर्षित किया। जैसे-
1. एक विद्यार्थी जो पढ़ाई में 7वीं कक्षा तक तो बहुत अच्छा था। पर 9वीं तक आते-आते अचानक वह पढ़ाई में कमजोर हो जाता है । इसका मतलब यह किसी अन्य कार्य में अपना समय दे रहा है जो अच्छी और बुरी दोनों ही संभावित है।

2. आधुनिक तकनीक का अत्यधिक उपयोग जैसे मोबाइल गेम्स, इंटरनेट, सोशल मीडिया -फेसबुक, व्हाट्सएप्प एवं इंस्टाग्राम आदि । इस प्रकार की तकनीक से बचे रहने की संभावना कम ही है पर जब इसका उपयोग लत बन जाये तो यह विद्यार्थी जीवन के लिए बहुत ही खतरनाक है।

3. विद्यार्थियों का पालकों या माता-पिता के साथ समय व्यतीत करना एवं एक मैत्रिक माहौल होना जिससे बच्चे के साथ या बच्चे के द्वारा होने वाली घटनाओं की जानकारी पालकों तक सत्यता के साथ पहुँचना अत्यंत अनिवार्य है। यह तभी सम्भव हो सकेगा जब पालक और हमारे विद्यार्थियों के बीच सरल व स्पष्ट वातावरण हो।

3. हमारे बच्चे के मित्र कैसे हैं या वो किन लोगों के साथ रहते है, घूमते हैं अथवा किसके संपर्क में हैं यह जानकारी अति आवश्यक है।

4. यदि बच्चा पालकों या शिक्षकों के बताए हुए बातों का तुरंत ही अवहेलना करता है या निर्देशों को नहीं मानता है , तो बच्चे से किसी भी प्रकार की दूरी बनाये बिना उसके मन-मष्तिष्क में क्या चल रहा है उस बारें जानने की कोशिश करना। वजह कुछ भी हो सकती है जिसकी वजह से बच्चे के व्यवहार में बदलाव आया है। ऐसे समय में हम सभी को यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को किसी भी प्रकार से मारे या डांटे नहीं। ऐसा अक्सर होता है कि किसी ने तो प्रभावित किया ही है जिसकी वजह से यह बदलाव आया है। यह भी हो सकता है कि वो कारण आप ही हों।

5. यदि बच्चा चिढ़-चिड़ा हो रहा है, या गुस्सा कर रहा है,या गलती करने के बाद भी पछतावा नहीं हो रहा है, या फिर जानबूझ कर वह उस गलती को दोहरा रहा है जिसके लिए आप या हम उसे बार-बार मना कर रहे हैं।

टी वी के सीरियल्स के कलाकारों की हमारा विद्यार्थी समय -समय पर अलग-अलग तरह का व्यवहार पप्रदर्षित कर रहा है, या बच्चे का मूड थोड़े समय तक ठीक और थोड़े समय बाद ही खराब हो रहा है ।

लोगों से मिलने से , बात करने से कतरा रहा है , या अंधेरे से डरना, रात को सोते समय नींद न आना या गहरी नींद से अचानक उठ जाना, या रात बहुत देर तक किसी न किसी बहाने से जागना । उपरोक्त सभी लक्षण हमारे और आपको सावधान होने का संकेत दे रहा है।

ये कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जहाँ बच्चे के टीचर्स एवं पेरेंट्स को भी बच्चे को सपोर्ट एवं अपनापन देने की आवश्यकता रहती है। ये हमें और आपको समझना चाहिए कि वह जीवन के एक नए पड़ाव पर कदम रख रहा है । बच्चों में कई मानसिक और शारीरिक बदलाव हो रहे होते हैं। यह बदलाव उसके जीवन को एक नई दिशा दे रहा होता है।

कार्यक्रम में उपस्थित हमारे कार्यकारिणी के सदस्य श्री सुनील जी जैन ने पालकों से अपने विचार साझा किए जिसमें उन्होंने बताया कि आज के इस वर्तमान समय में बच्चों को आप पुराने समय की तरह डाँट कर या पीटकर नहीं सुधार सकते। बच्चों के साथ आपको एक दोस्ताना व्यवहार रखना पड़ेगा ही।
क्योंकि वह ऐसे माहौल में रह रहा है जो उसे नित नए जानकारी से अवगत करा देता है चाहे वह उसके भविष्य के लिए सही हो अथवा नहीं।

श्री सुनील जी ने बच्चों से भी कहा कि बच्चों आपको यह बात याद रखनी चाहिए कि यदि आपके जीवन में कोई सच्चा मित्र या हितैशी है तो वो केवल और केवल आपके माता और पिता ही है।

इसके साथ ही श्री जैन सर ने प्राचार्या महोदया को ऐसे सजग एवं लाभकारी परिचर्चा हेतु कार्यक्रम के लिए धन्यवाद दिया एवं भविष्य में ऐसे कई आयोजन करने की सहमति भी दी।

कार्यक्रम में उपस्थित हमारे विद्यालय के सेक्रेटरी श्री सतीश जी गुप्ता ने अपने विचार पालकों के साथ साझा किया। जिसमें उन्होंने बताया कि बच्चों के जरूरतों को ध्यान में रखना बहुत अच्छी बात है। किंतु कभी भी न नहीं कहना यह भी हमेशा सही नहीं होता है। बच्चे को वस्तु एवं परिस्थितियों के अभाव का आभास कराना भी अति आवश्यक है। इस उम्र में ये आभास उन्हें सम्पूर्ण जीवन में इसकी उपयोगिता और महत्व की सीख देता है।

विद्यालय की उप प्राचार्या श्रीमती सारिका शर्मा जी ने मंच का संचालन किया एवं सी.बी.एस.ई. के नए परीक्षा नियमावली की जानकारी भी सभी पालकों के साथ साझा किया। विद्यालय परिवार इस परिचर्चा कार्यक्रम में पधारे सभी पालकों एवं हमारे विद्यालय के संचालकों का सहृदय धन्यवाद एवं अभिनंदन करता है। जो इस वर्तमान समय मे समाज को समृद्ध नागरिक देने के लिए अग्रसर है।

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